“एक कर्मचारी ने 15 साल की अनुपस्थिति के बाद कंपनी से सैलरी वृद्धि की मांग की, कंपनी ने घर बैठे 65 साल तक बेसिक सैलरी देने की पेशकश की लेकिन इंक्रीमेंट देने से इनकार कर दिया, जिसके चलते मामला बॉम्बे हाई कोर्ट पहुंचा जहां कर्मचारी ने सेवा नियमों के तहत बैक इंक्रीमेंट और प्रमोशन की मांग की है।”
मुंबई की एक प्रमुख IT फर्म में काम करने वाले राजेश कुमार ने 2011 में आखिरी बार ऑफिस में हाजिरी लगाई थी। उसके बाद से वे बिना किसी आधिकारिक मंजूरी के अनुपस्थित रहे, लेकिन कंपनी की ओर से उनकी सैलरी लगातार जारी रही क्योंकि लेबर कोर्ट के पुराने आदेशों के कारण टर्मिनेशन प्रक्रिया जटिल हो गई थी। कंपनी ने हाल ही में एक प्रस्ताव रखा कि कुमार 65 साल की रिटायरमेंट उम्र तक घर पर रहें, उन्हें बेसिक सैलरी मिलती रहेगी, लेकिन कोई वार्षिक इंक्रीमेंट या प्रमोशन नहीं दिया जाएगा। कुमार ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार करते हुए कहा कि सेवा नियमों के अनुसार उन्हें पिछले 15 सालों की इंक्रीमेंट और बैक पेमेंट मिलना चाहिए, अन्यथा कंपनी कोर्ट में जवाब दे।
कंपनी के HR डिपार्टमेंट ने दावा किया कि अनुपस्थिति के दौरान कुमार ने कोई योगदान नहीं दिया, इसलिए इंक्रीमेंट का कोई आधार नहीं बनता। लेकिन कुमार के वकील ने तर्क दिया कि अगर सैलरी जारी रही तो सेवा निरंतर मानी जानी चाहिए, और लेबर एक्ट के सेक्शन 25F के तहत अनुपस्थिति को अनुशासनहीनता माना जाए तो भी इंक्रीमेंट रोकने का प्रावधान नहीं है। मामला अब बॉम्बे हाई कोर्ट में है, जहां सुनवाई के दौरान जज ने दोनों पक्षों से सेवा रिकॉर्ड और पेमेंट हिस्ट्री मांगी है।
भारतीय लेबर लॉ में ऐसे मामले असामान्य नहीं हैं, जहां कर्मचारी लंबी अनुपस्थिति के बावजूद सैलरी क्लेम करते हैं। उद्योग विशेषज्ञों के अनुसार, प्राइवेट सेक्टर में औसतन 5% कर्मचारी सालाना अनुपस्थिति के कारण डिस्प्यूट में फंसते हैं, जबकि PSU में यह आंकड़ा 12% तक पहुंचता है। कुमार का केस सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों से प्रेरित लगता है, जहां नोशनल इंक्रीमेंट को रिटायरमेंट के करीब कर्मचारियों के लिए मंजूर किया गया है।
कुंजी पॉइंट्स:
अनुपस्थिति की वजह: कुमार ने स्वास्थ्य और पारिवारिक कारणों का हवाला दिया, लेकिन कंपनी का कहना है कि कोई मेडिकल सर्टिफिकेट नहीं जमा किया गया।
कंपनी की पेशकश: 65 साल तक बेसिक सैलरी (वर्तमान में ₹45,000 मासिक), कोई DA या HRA नहीं, और रिटायरमेंट पर ग्रेच्युटी।
कर्मचारी की मांग: 15 साल की बैक इंक्रीमेंट (कुल ₹25 लाख अनुमानित), प्रमोशन टू सीनियर पोजिशन, और पेंशन बेनिफिट्स।
कोर्ट की भूमिका: हाई कोर्ट ने अंतरिम आदेश में कंपनी को सैलरी जारी रखने को कहा, लेकिन इंक्रीमेंट पर स्टे लगा दिया।
| घटनाक्रम | विवरण | प्रभाव |
|---|---|---|
| 2011 | कुमार की आखिरी हाजिरी, अनुपस्थिति शुरू। | कंपनी ने नोटिस जारी किया लेकिन टर्मिनेशन नहीं किया। |
| 2015 | कंपनी ने इंक्वायरी कमिटी बनाई, कुमार ने जवाब नहीं दिया। | सैलरी जारी रही, लेकिन इंक्रीमेंट रोका गया। |
| 2020 | महामारी के दौरान कंपनी ने रिव्यू किया, अनुपस्थिति को अनदेखा किया। | कुमार को घर से काम का ऑफर, लेकिन अस्वीकार। |
| 2025 | कंपनी का प्रस्ताव: घर बैठे सैलरी तक 65 साल। | कुमार ने असहमति जताई, कोर्ट में याचिका दायर। |
| 2026 | सुनवाई शुरू, जज ने दस्तावेज मांगे। | मामला लंबित, अगली डेट फरवरी में। |
कुमार के वकील ने तर्क दिया कि इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट एक्ट 1947 के तहत अगर सेवा ब्रेक नहीं मानी गई तो इंक्रीमेंट अनिवार्य है। कंपनी की ओर से पेश हुए एडवोकेट ने कहा कि अनुपस्थिति को ‘अब्सेंट विदाउट लीव’ माना जाए, जिसके लिए पेनल्टी के रूप में इंक्रीमेंट रोकना वैध है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर कोर्ट कुमार के पक्ष में फैसला देता है तो यह प्राइवेट सेक्टर में एक प्रेसिडेंट सेट करेगा, जहां कंपनियां लंबी अनुपस्थिति वाले कर्मचारियों को आसानी से हैंडल नहीं कर पाएंगी।
उद्योग में ऐसे मामलों की संख्या बढ़ रही है। NASSCOM की रिपोर्ट के अनुसार, IT सेक्टर में 2025 में अनुपस्थिति से जुड़े डिस्प्यूट 18% बढ़े हैं, मुख्यतः रिमोट वर्क पॉलिसी के कारण। कुमार का केस इससे अलग है क्योंकि इसमें कोई काम नहीं किया गया, फिर भी सैलरी क्लेम है। कोर्ट में पेश किए गए दस्तावेजों से पता चला कि कुमार की मूल सैलरी 2011 में ₹30,000 थी, जो बिना इंक्रीमेंट के ही जारी है, जबकि साथी कर्मचारियों की सैलरी अब ₹80,000 तक पहुंच चुकी है।
संभावित परिणाम:
अगर कुमार जीतते हैं: कंपनियों को अनुपस्थिति पॉलिसी सख्त करनी पड़ेगी, और बैक इंक्रीमेंट का बोझ बढ़ेगा।
अगर कंपनी जीतती है: कर्मचारियों के लिए लंबी लीव पर सैलरी सिक्योरिटी कमजोर होगी।
लेबर यूनियनों की भूमिका: कई यूनियन कुमार का समर्थन कर रही हैं, दावा कर रही हैं कि यह कर्मचारी अधिकारों का मुद्दा है।
कुमार ने कोर्ट में कहा कि कंपनी की पेशकश अपमानजनक है, क्योंकि घर बैठे सैलरी मिलने से करियर ग्रोथ रुक जाती है। कंपनी ने जवाब में कहा कि 15 साल में कोई परफॉर्मेंस रिव्यू नहीं हुआ, इसलिए इंक्रीमेंट जस्टिफाई नहीं होता। हाई कोर्ट के जज ने दोनों पक्षों को मध्यस्थता की सलाह दी, लेकिन कुमार ने अस्वीकार कर दिया। मामला अब सबूतों पर टिका है, जहां कंपनी को साबित करना होगा कि अनुपस्थिति जानबूझकर थी।
भारतीय कोर्ट्स में ऐसे केस औसतन 2-3 साल चलते हैं, लेकिन यह हाई-प्रोफाइल होने से जल्दी निपट सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, अगर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा तो नोशनल इंक्रीमेंट पर नया गाइडलाइन आ सकता है, जैसा कि हाल के रिटायरमेंट केसों में हुआ है। कुमार का दावा है कि सेवा नियमों में ‘कंटिन्यूअस सर्विस’ का प्रावधान इंक्रीमेंट को अनिवार्य बनाता है, भले ही फिजिकल प्रेजेंस न हो।
संबंधित आंकड़े:
भारत में लेबर डिस्प्यूट: 2025 में 45,000 से ज्यादा केस रजिस्टर्ड, जिनमें 20% सैलरी और इंक्रीमेंट से जुड़े।
IT सेक्टर में अनुपस्थिति रेट: 7% औसत, लेकिन लंबी अनुपस्थिति वाले केस 2%।
रिटायरमेंट एज डिबेट: कई राज्यों में 60 से 65 साल करने की मांग, लेकिन प्राइवेट सेक्टर में 58-60 आम।
कंपनी ने कोर्ट में पेश किया कि कुमार को कई नोटिस भेजे गए, लेकिन कोई रिस्पॉन्स नहीं आया। कुमार के पक्ष में यह तर्क है कि अगर कंपनी ने टर्मिनेशन नहीं किया तो सेवा जारी मानी जाती है। यह केस कर्मचारी अधिकारों और कंपनी पॉलिसी के बीच संतुलन पर सवाल उठाता है, खासकर पोस्ट-पैंडेमिक दौर में जहां रिमोट वर्क नॉर्मल है।
Disclaimer: यह लेख समाचार रिपोर्टों, विशेषज्ञ राय और उपलब्ध स्रोतों पर आधारित है।