एक टिफिन लेकर पहुंचे मुंबई, 10 में से 9 बार हुए फेल; फिर कबाड़ ने बदली तकदीर, आज जेब में ₹42 हजार करोड़

“बिहार के पटना से महज 19 साल की उम्र में एक टिफिन और थोड़े पैसे लेकर मुंबई पहुंचे अनिल अग्रवाल ने शुरुआती कारोबार में 9 बार असफलता का सामना किया, लेकिन स्क्रैप मेटल के छोटे कारोबार से वेदांता ग्रुप जैसी ग्लोबल माइनिंग कंपनी खड़ी कर ली, जिसकी वैल्यूएशन आज हजारों करोड़ में है और उनकी नेट वर्थ करीब 42 हजार करोड़ रुपये के आसपास पहुंच चुकी है।”

अनिल अग्रवाल: स्क्रैप से अरबपति तक का सफर

पटना में जन्मे अनिल अग्रवाल ने पढ़ाई बीच में छोड़ दी और पिता के छोटे कारोबार में हाथ बंटाया। लेकिन बड़ा सपना देखने वाले इस युवा ने 19 साल की उम्र में मुंबई का रुख किया। हाथ में सिर्फ एक स्टील का टिफिन, कुछ सौ रुपये और पटना से लाए गए जुगाड़ का जोश था। मुंबई की चकाचौंध में उन्होंने पहले छोटे-मोटे ट्रेडिंग का प्रयास किया, लेकिन 10 में से 9 बार असफल रहे। कई बार डिप्रेशन ने घेरा, आर्थिक तंगी ने तोड़ने की कोशिश की, मगर हार नहीं मानी।

शुरुआत हुई स्क्रैप मेटल के कारोबार से। मुंबई के लोअर परेल और दादर इलाकों में पुराने केबल, मोटर पार्ट्स और धातु के टुकड़े इकट्ठा करके बेचना शुरू किया। शुरुआती पूंजी महज 7,000 रुपये थी और किराए का कमरा 21 रुपये में लिया। अंग्रेजी नहीं आती थी, डिग्री नहीं थी, कनेक्शन नहीं थे, लेकिन मेहनत और बाजार की समझ थी। धीरे-धीरे उन्होंने जेली फिल्ड केबल ट्रेडिंग में कदम रखा। छोटी फैक्ट्री लगाई और स्क्रैप से निकलने वाली धातुओं को रिफाइन करके बेचने लगे।

1970 के दशक में भारत में माइनिंग और मेटल सेक्टर में अवसर दिखे। अनिल अग्रवाल ने 1979 में वेदांता का पहला प्लांट राजस्थान में लगाया। फिर 1980 के दशक में हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड में हिस्सेदारी खरीदी, जो सरकारी कंपनी थी। उन्होंने कंपनी को प्राइवेटाइजेशन के बाद खरीदकर वेदांता रिसोर्सेज का हिस्सा बनाया। आज वेदांता ग्रुप जिंक, लेड, एल्युमिनियम, कॉपर, आयरन ओर, ऑयल और गैस जैसे कई सेक्टर में काम करता है।

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ग्रुप की प्रमुख कंपनियां वेदांता लिमिटेड, हिंदुस्तान जिंक, भारत एल्युमिनियम कंपनी (BALCO), मद्रास एल्युमिनियम और स्टेरलाइट कॉपर हैं। भारत में सबसे बड़े जिंक प्रोड्यूसर हिंदुस्तान जिंक के जरिए वेदांता दुनिया में टॉप जिंक प्रोड्यूसरों में शुमार है। ग्रुप की ऑपरेशंस भारत के अलावा जाम्बिया, नामीबिया, आयरलैंड और UAE तक फैली हैं।

अनिल अग्रवाल ने हमेशा भारत में मैन्युफैक्चरिंग और माइनिंग को बढ़ावा दिया। उन्होंने न सिर्फ हजारों रोजगार पैदा किए, बल्कि रिमोट इलाकों में इंफ्रास्ट्रक्चर भी विकसित किया। ग्रुप की कुल वैल्यूएशन कई लाख करोड़ तक पहुंच चुकी है, जबकि चेयरमैन अनिल अग्रवाल की पर्सनल नेट वर्थ हालिया रिपोर्ट्स के अनुसार करीब 42 हजार करोड़ रुपये के आसपास है। यह आंकड़ा ग्लोबल मेटल प्राइसेज, कंपनी परफॉर्मेंस और मार्केट कैप पर निर्भर करता है।

उनकी सफलता का राज लगातार रिस्क लेना, फेलियर से सीखना और भारत की ग्रोथ स्टोरी पर भरोसा रखना रहा। आज वेदांता ग्रुप भारत के सबसे बड़े नॉन-फेरस मेटल प्रोड्यूसरों में से एक है और अनिल अग्रवाल सेल्फ-मेड अरबपतियों की लिस्ट में शीर्ष पर हैं।

Disclaimer: यह लेख प्रेरणादायक सफलता की कहानी पर आधारित है और उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी पर तैयार किया गया है। निवेश संबंधी कोई सलाह नहीं है।

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