“ईरान-इज़राइल युद्ध के कारण वैश्विक तेल आपूर्ति में अब तक की सबसे बड़ी कमी आई है। ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत 101 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई है, जिससे भारत में पेट्रोल-डीजल और एविएशन फ्यूल के भाव तेजी से बढ़ने का खतरा मंडरा रहा है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जहाजों की आवाजाही लगभग ठप होने से 20% वैश्विक तेल सप्लाई प्रभावित हुई है, जिसका सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था, हवाई यात्रा और घरेलू ईंधन पर पड़ सकता है।”
ईरान-इज़राइल युद्ध: पेट्रोल-एविएशन फ्यूल दामों पर गहराता संकट
ईरान और इज़राइल के बीच चल रहा युद्ध अब वैश्विक ऊर्जा बाजार को हिला रहा है। फरवरी 2026 के अंत में अमेरिका-इज़राइल की संयुक्त कार्रवाई से शुरू हुआ संघर्ष अब तीसरे हफ्ते में प्रवेश कर चुका है। इस दौरान ईरान ने जवाबी हमलों में क्षेत्रीय तेल सुविधाओं को निशाना बनाया, जिससे स्ट्रेट ऑफ होर्मुज – दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग – लगभग बंद हो गया। इस चोकपॉइंट से रोजाना करीब 20 मिलियन बैरल तेल गुजरता है, जो वैश्विक आपूर्ति का 20% है।
युद्ध शुरू होने के बाद से ब्रेंट क्रूड की कीमत में 40% से अधिक की उछाल आई है। वर्तमान में ब्रेंट क्रूड 101-103 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा है, जबकि युद्ध से पहले यह 70-80 डॉलर के दायरे में था। कुछ दिनों में यह 119 डॉलर तक छू चुका था। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने इसे इतिहास की सबसे बड़ी तेल आपूर्ति बाधा करार दिया है।
भारत पर असर सबसे गहरा क्योंकि देश अपनी 85% से अधिक क्रूड जरूरत आयात करता है, जिसमें मध्य पूर्व का हिस्सा बड़ा है। बढ़ती कीमतों से भारत का आयात बिल आसमान छू सकता है, जिससे करेंट अकाउंट डेफिसिट बढ़ेगा और रुपया कमजोर होगा। अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि अगर कीमतें 100 डॉलर पर लंबे समय तक टिकी रहीं तो भारत की जीडीपी ग्रोथ में 0.5-1% की कमी आ सकती है और महंगाई तेज हो सकती है।
पेट्रोल-डीजल दामों पर खतरा
भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें फिलहाल स्थिर हैं, लेकिन वैश्विक उछाल का असर जल्द दिख सकता है। ऑयल मार्केटिंग कंपनियां पहले से ही उच्च क्रूड लागत का बोझ उठा रही हैं। अगर ब्रेंट 100 डॉलर से ऊपर बना रहा तो पेट्रोल-डीजल में 5-10 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी संभव है। कुछ रिपोर्ट्स में चेतावनी दी गई है कि लंबे समय तक उच्च कीमतें बनी रहीं तो LPG सब्सिडी बढ़ानी पड़ सकती है, जिससे सरकारी खजाने पर दबाव बढ़ेगा।
हवाई ईंधन (ATF) के दामों में तेज उछाल
एविएशन सेक्टर सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है। जेट फ्यूल की कीमतें युद्ध से पहले 85-90 डॉलर प्रति बैरल थीं, जो अब 150-200 डॉलर के बीच पहुंच गई हैं – यानी दोगुनी से अधिक। भारतीय एयरलाइंस ने तुरंत कार्रवाई की:
एयर इंडिया और एयर इंडिया एक्सप्रेस ने 12 मार्च से घरेलू उड़ानों पर 399 रुपये का फ्यूल सरचार्ज लगाया।
SAARC देशों के लिए भी यही सरचार्ज।
गल्फ और वेस्ट एशिया रूट्स पर 10 डॉलर अतिरिक्त।
यूरोप के लिए सरचार्ज 100 से बढ़ाकर 125 डॉलर, उत्तर अमेरिका के लिए 150 से 200 डॉलर।
इंडिगो जैसी कम लागत वाली एयरलाइंस पर भी दबाव है। एविएशन टरबाइन फ्यूल एयरलाइन लागत का 30-40% हिस्सा है। ब्रेंट में हर 5 डॉलर की बढ़ोतरी से इंडिगो जैसी कंपनियों की कमाई 13% तक गिर सकती है।
मध्य पूर्व एयरस्पेस बंद होने से उड़ानें लंबी हो गई हैं, जिससे अतिरिक्त ईंधन खपत बढ़ी है। कई उड़ानें रद्द या विलंबित हुईं, जिससे यात्रियों को अधिक किराया चुकाना पड़ रहा है। अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के किराए में 15% तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
अन्य प्रभाव और संभावित परिदृश्य
महंगाई का दबाव : ऊर्जा कीमतें बढ़ने से ट्रांसपोर्ट, लॉजिस्टिक्स और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में लागत बढ़ेगी, जो उपभोक्ता सामान पर असर डालेगी।
रुपया और स्टॉक मार्केट : उच्च आयात बिल से रुपया और कमजोर होगा, जिससे FII आउटफ्लो बढ़ सकता है।
संभावित राहत : IEA ने रिकॉर्ड 400 मिलियन बैरल इमरजेंसी रिजर्व रिलीज की घोषणा की है, लेकिन स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद रहने से इसका असर सीमित है। अमेरिका ने भी अपने रिजर्व से तेल छोड़ा है।
युद्ध लंबा खिंचा तो पेट्रोल-हवाई ईंधन के दाम आसमान छू सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर होर्मुज मार्ग पूरी तरह बंद रहा तो वैश्विक अर्थव्यवस्था में मंदी का खतरा बढ़ जाएगा। भारत सरकार स्थिति पर नजर रख रही है, लेकिन उच्च कीमतों से बचना चुनौतीपूर्ण होगा।